
भगवान श्री बलभद्र
हलधर • संकर्षण • बलदेव • दाऊजी
एक नज़र में
- अन्य नाम: बलराम, बलदेव, हलधर, हलायुध, संकर्षण, रौहिणेय, नीलांबर, दाऊजी
- वंश: यदुवंश
- पिता: वसुदेव · माता: रोहिणी (गर्भ देवकी से रोहिणी में स्थानांतरित हुआ)
- भाई-बहन: श्रीकृष्ण (छोटे भाई) और सुभद्रा
- पत्नी: रेवती, राजा ककुद्मी की पुत्री
- शस्त्र: हल और मूसल
- ध्वज: ताड़ (तालध्वज)
- स्वरूप: गौर वर्ण, नीले वस्त्र
- मान्यता: शेषनाग के अवतार; कुछ वैष्णव परंपराओं में भगवान विष्णु के अवतारों में गिने जाते हैं
जन्म और नाम की कथा
पुराणों के अनुसार कंस के कारागार में देवकी के सातवें गर्भ को योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया। गर्भ के "खिंचकर" (आकर्षित होकर) आने के कारण उन्हें संकर्षण कहा गया। अपार बल के कारण वे बलराम, बलदेव और बलभद्र कहलाए। बाल्यकाल उन्होंने श्रीकृष्ण के साथ गोकुल-वृंदावन में बिताया।
हल और मूसल का अर्थ
हल खेती, अन्न और समृद्धि का तथा मूसल शक्ति और रक्षा का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए वे हलधर कहलाते हैं और किसानों व श्रमजीवी समाज में विशेष श्रद्धा से पूजे जाते हैं। हल और मूसल के साथ बलराम की सबसे प्राचीन प्रतिमाएँ मथुरा और मध्य प्रदेश के तुमैन क्षेत्र से मिली हैं, जिन्हें लगभग ईसा पूर्व दूसरी-पहली शताब्दी का माना जाता है।
श्री जगन्नाथ परंपरा में
पुरी (ओडिशा) में भगवान जगन्नाथ और देवी सुभद्रा के साथ श्री बलभद्र की पूजा होती है। रथ यात्रा में उनका रथ तालध्वज कहलाता है और उन्हें श्वेत वर्ण में दर्शाया जाता है।
कलवार समाज में आस्था
कलवार (कलार/कलाल) समाज के अनेक परिवार भगवान बलभद्र को अपना कुल-देवता मानकर पूजते हैं। यह मान्यता उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में प्रचलित है।
जयंती और पर्व
भगवान बलभद्र की जयंती हल षष्ठी (हरछठ / ललही छठ / बलदेव छठ) के रूप में भाद्रपद मास की षष्ठी को मनाई जाती है। क्षेत्र और पंचांग के अनुसार तिथि भिन्न हो सकती है — कहीं कृष्ण पक्ष की षष्ठी, तो कहीं शुक्ल पक्ष की षष्ठी।
- इस दिन हल, मूसल और बलराम जी का पूजन किया जाता है।
- परंपरा के अनुसार माताएँ संतान की दीर्घायु और सुख के लिए व्रत रखती हैं।
- व्रत में हल से जोते गए अन्न का प्रयोग नहीं किया जाता।
- सटीक तिथि हर वर्ष पंचांग के अनुसार देखें।
