॥ भगवान राज राजेश्वर श्री सहस्त्रार्जुनाय नमः ॥
॥ ॐ बलभद्राय नमः ॥
हमारा समाज हमारी पहचान हमारी शक्ति

ईष्ट देव · God & Deity

॥ ॐ बलभद्राय नमः ॥ ॥ भगवान राज राजेश्वर श्री सहस्त्रार्जुनाय नमः ॥

कलवार समाज की परंपरा में भगवान श्री बलभद्र और भगवान राज राजेश्वर श्री सहस्त्रार्जुन (सहस्रबाहु अर्जुन) को आराध्य कुल-देवता के रूप में पूजा जाता है। इन्हीं की आस्था से समाज अपनी जड़ों, संस्कारों और एकता को संजोए हुए है।

भगवान श्री बलभद्र
भगवान श्री बलभद्र

भगवान श्री बलभद्र

हलधर • संकर्षण • बलदेव • दाऊजी

एक नज़र में

  • अन्य नाम: बलराम, बलदेव, हलधर, हलायुध, संकर्षण, रौहिणेय, नीलांबर, दाऊजी
  • वंश: यदुवंश
  • पिता: वसुदेव · माता: रोहिणी (गर्भ देवकी से रोहिणी में स्थानांतरित हुआ)
  • भाई-बहन: श्रीकृष्ण (छोटे भाई) और सुभद्रा
  • पत्नी: रेवती, राजा ककुद्मी की पुत्री
  • शस्त्र: हल और मूसल
  • ध्वज: ताड़ (तालध्वज)
  • स्वरूप: गौर वर्ण, नीले वस्त्र
  • मान्यता: शेषनाग के अवतार; कुछ वैष्णव परंपराओं में भगवान विष्णु के अवतारों में गिने जाते हैं

जन्म और नाम की कथा

पुराणों के अनुसार कंस के कारागार में देवकी के सातवें गर्भ को योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया। गर्भ के "खिंचकर" (आकर्षित होकर) आने के कारण उन्हें संकर्षण कहा गया। अपार बल के कारण वे बलराम, बलदेव और बलभद्र कहलाए। बाल्यकाल उन्होंने श्रीकृष्ण के साथ गोकुल-वृंदावन में बिताया।

हल और मूसल का अर्थ

हल खेती, अन्न और समृद्धि का तथा मूसल शक्ति और रक्षा का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए वे हलधर कहलाते हैं और किसानों व श्रमजीवी समाज में विशेष श्रद्धा से पूजे जाते हैं। हल और मूसल के साथ बलराम की सबसे प्राचीन प्रतिमाएँ मथुरा और मध्य प्रदेश के तुमैन क्षेत्र से मिली हैं, जिन्हें लगभग ईसा पूर्व दूसरी-पहली शताब्दी का माना जाता है।

श्री जगन्नाथ परंपरा में

पुरी (ओडिशा) में भगवान जगन्नाथ और देवी सुभद्रा के साथ श्री बलभद्र की पूजा होती है। रथ यात्रा में उनका रथ तालध्वज कहलाता है और उन्हें श्वेत वर्ण में दर्शाया जाता है।

कलवार समाज में आस्था

कलवार (कलार/कलाल) समाज के अनेक परिवार भगवान बलभद्र को अपना कुल-देवता मानकर पूजते हैं। यह मान्यता उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में प्रचलित है।

जयंती और पर्व

भगवान बलभद्र की जयंती हल षष्ठी (हरछठ / ललही छठ / बलदेव छठ) के रूप में भाद्रपद मास की षष्ठी को मनाई जाती है। क्षेत्र और पंचांग के अनुसार तिथि भिन्न हो सकती है — कहीं कृष्ण पक्ष की षष्ठी, तो कहीं शुक्ल पक्ष की षष्ठी।

  • इस दिन हल, मूसल और बलराम जी का पूजन किया जाता है।
  • परंपरा के अनुसार माताएँ संतान की दीर्घायु और सुख के लिए व्रत रखती हैं।
  • व्रत में हल से जोते गए अन्न का प्रयोग नहीं किया जाता।
  • सटीक तिथि हर वर्ष पंचांग के अनुसार देखें।
भगवान राज राजेश्वर श्री सहस्त्रार्जुन
भगवान राज राजेश्वर श्री सहस्त्रार्जुन

भगवान राज राजेश्वर श्री सहस्त्रार्जुन

कार्तवीर्य अर्जुन • सहस्रबाहु • हैहय वंश के राजा

एक नज़र में

  • अन्य नाम: कार्तवीर्य अर्जुन, सहस्रबाहु अर्जुन, राजराजेश्वर, राजाधिराज राजेश्वर
  • वंश: हैहय वंश (यदुवंश की एक शाखा)
  • पिता: राजा कृतवीर्य
  • राजधानी: माहिष्मती, नर्मदा तट — वर्तमान महेश्वर (मध्य प्रदेश) माना जाता है
  • विशेषता: भगवान दत्तात्रेय की कृपा से सहस्र (हज़ार) भुजाओं का वरदान
  • मान्यता: नारद पुराण आदि में भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का अवतार माने गए हैं
  • प्रमुख स्थल: श्री राज राजेश्वर मंदिर, महेश्वर (ज़िला खरगोन, मध्य प्रदेश)

नाम की कथा

कथा है कि कृतवीर्य के पुत्र कार्तवीर्य ने घोर तपस्या से भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न किया और वरदान में एक हज़ार भुजाएँ माँगीं। इसी से वे सहस्रबाहु अर्जुन / सहस्त्रार्जुन कहलाए।

नर्मदा और रावण का प्रसंग

लोक-मान्यता और पौराणिक कथाओं के अनुसार नर्मदा में जलक्रीड़ा के समय सहस्त्रार्जुन ने अपनी हज़ार भुजाओं से नदी का प्रवाह रोक दिया। नीचे रेत का शिवलिंग बनाकर पूजा कर रहे रावण की पूजा बह गई। क्रोधित रावण ने युद्ध किया, पर पराजित हुआ और बंदी बना लिया गया। रावण पर विजय के कारण उन्हें "राजराजेश्वर" की उपाधि मिली।

महेश्वर का मंदिर

नर्मदा तट पर बसे महेश्वर को हैहय राजा सहस्त्रार्जुन की नगरी माना जाता है और वहाँ श्री राज राजेश्वर मंदिर स्थित है।

  • मंदिर में 11 अखंड दीप (देसी घी के) जलते रहने की मान्यता है।
  • श्रद्धालु खोई हुई वस्तु या सम्मान की पुनः प्राप्ति की मन्नत माँगने आते हैं।

कलवार समाज में आस्था

कलवार समाज के अनेक परिवार स्वयं को सहस्त्रार्जुन का वंशज मानते हैं और उन्हें अपना आराध्य कुल-देवता मानकर पूजते हैं।

जयंती

सहस्त्रार्जुन जयंती सामान्यतः कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को, दीपावली के बाद मनाई जाती है। महेश्वर में अगहन (मार्गशीर्ष) मास की शुक्ल सप्तमी को भी विशेष उत्सव की परंपरा बताई जाती है। सटीक तिथि हर वर्ष पंचांग के अनुसार बदलती है।

पौराणिक प्रसंग

पुराणों में उनके जीवन से जुड़े अन्य प्रसंग भी मिलते हैं, जैसे ऋषि जमदग्नि की कामधेनु गाय का प्रसंग और उसके बाद भगवान परशुराम से हुआ संघर्ष। ग्रंथों और क्षेत्रीय परंपराओं में इनके विवरण भिन्न हैं।

पूजा-परंपरा · Traditions

कुल-देवता की पूजा-पद्धति, पर्व और रीति-रिवाज़ अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में भिन्न हो सकते हैं। अपने परिवार और क्षेत्र की परंपरा के बारे में अपने बड़ों से अवश्य जानें और उसे आगे बढ़ाएँ।

इस पेज की जानकारी पुराणों, महेश्वर की स्थानीय मान्यताओं और समाज में प्रचलित परंपराओं पर आधारित एक सामान्य परिचय है। तिथियाँ और कथाएँ क्षेत्र व पंचांग के अनुसार भिन्न हो सकती हैं। सुधार या सुझाव के लिए कृपया "संपर्क" पेज से हमें लिखें।